Skip to main content

श्राद्ध कैसे और कब करना चाहिए


श्राद्ध कैसे और कब करना चाहिए 
आश्विन कृष्ण पक्ष एवं वार्षिक  श्राद्ध के लिए सबसे पहले हमें पितरों की मोक्ष तिथि का ज्ञान होना आवश्यक होता है ।
अतः जिस समय जीवात्मा ने इस पार्थिव शरीर का त्याग किया,
जो तिथि उस समय होती है,  वही मोक्ष तिथि कहलाती हैं।
अतः हमने अपने पितरों के लिए जो भी श्राद्ध करना, तर्पण दान इत्यादि करना है, वह सब मोक्ष तिथि के अनुसार ही करना चाहिए। मरणोपरांत से लेकर वार्षिक श्राद्ध होने के बाद हम अपने पितरों के लिए संक्रांति के दिन, अक्षय तृतीया, अक्षय नवमी, गंगा दशहरा, गंगा जयंती, पितरों के मोक्ष तिथि के दिन, दीपावली, दशहरा, अक्षय  मकर संक्रांति, सोमवती अमावस्या, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण के समय 
महाविषुव दिन  (महाविषुव दिन उसे कहते हैं जिस दिन, दिन और रात बराबर होते हैं) भी श्राद्ध कर सकते हैं। 
जो लोग श्राद्ध नहीं करते हैं, अज्ञातवास में श्राद्ध ना करना, या जानबूझकर जो श्राद्ध नहीं करते हैं, और शास्त्र के अनुसार श्राद्ध नहीं करते हैं, शास्त्र समय अनुसार, शास्त्र की आज्ञा अनुसार जो श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितृदेव श्राद्ध ग्रहण नहीं करते हैं, और जब पितृ श्राद्ध ग्रहण नहीं करते हैं तो फिर पितृ दोष उत्पन्न हो जाता है। पितृ अप्रसन्न होने से घर में अनेक प्रकार की हानियां होती है जैसे÷ पितरों के शाप से शोक, धनकी हानि, व्यापार में चोरी होना, व्यापार में घाटा आना, धन का बार-बार नुकसान होना एवं व्यापार में आग और जल से नुकसान हो जाना, गरीबी,
वंश बृद्धि का ना होना, पुत्र हानि, गर्भपात, अकाल मृत्यु, अत्याधिक प्रसव पीड़ा, मृत्युतुल्य कष्ट,  घर में कलह क्लेश, झगड़े,  अनेक प्रकार की व्याधियाँ, महारोग, वैवाहिक जीवन में असंतोष
बुरे स्वप्न आना,  जिसे पितृदोष के रूप में जाना जाता है। इस संदर्भ आदित्यपुराण में उल्लेख है- 
न सन्ति पितरश्चे्‌ति कृत्वा मनसि यो नरः। 
श्राद्धं न कुरूते तत्र तस्य रक्तं पिबन्ति ते ॥ 

"अतर्पिता शरीरं रुधिर पिबन्ति"
जो लोग अपने पितरों का श्राद्ध शास्त्रसमय पर नहीं करते हैं या बिल्कुल नहीं करते हैं, उनके पितृ उन पर कुपित हो जाते है  और जब पितृदेव अप्रसन्न हो जाते हैं, तब वह पितृ अपने वंश का ही खून पीना शुरू कर देते हैं ।
अतः फिर वंश में अनेक प्रकार की बीमारियां, वंश की वृद्धि ना होना जैसे हम ऊपर लिख चुके हैं, यह सब तब होता है जब पितरों को तिलाञ्जलि, जलाञ्जलि एवं उनके श्राद्ध विधिवत शास्त्रानुसार से नहीं किए जाते हैं,  तो यह सब लक्षण पितृदोष रूप में बन जाते हैं। जब  पितृ प्रसन्न नहीं होते हैं तब वह अपने वंश का खून पीना, रक्त पीना शुरू कर देतें है, और वंश समाप्त होने पर आ जाता है।

श्राद्ध के संदर्भ ब्रह्मपुराण,  मत्स्यपुराण तथा गरूड़पुराणादि
विभिन्न स्मृतियों में उल्लेख मिलता है।  ब्रह्मपुराण के अनुसार हव्य से देवताओं का और कव्य से पितृगणों का तथा अन्न द्वारा बंधुजनों का स्वागत करना चाहिए। पाराशर, जाबालि आदि ऋषियों तथा पुराणों में श्राद्ध करने पर सर्वत्र जोर दिया गया है।

कुर्वीत समये श्राद्धं कुले कश्चिन्न सीदति।
आयुः पुत्रान् यशः स्वर्गं कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।
देवकार्यादपि सदा पितृकार्यं विशिष्यते।।
देवताभ्यः पितृणां हि पूर्वमाप्यायनं शुभम्।
                     अर्थात्
समयानुसार श्राद्ध करने से कुल में कोई दुःखी नहीं रहता। पितरों की पूजा करके मनुष्य आयु, पुत्र, यश, स्वर्ग, कीर्ति, पुष्टि, बल, श्री, पशु, सुख और धन-धान्य प्राप्त करता है। देवकार्य से भी पितृकार्य का विशेष महत्त्व है। देवताओं से पहले पितरों को प्रसन्न करना अधिक कल्याणकारी है।

श्राद्ध करने से पितरों को मोक्ष कैसे प्राप्त होता है÷
 पितृ लोक में हमारे पितृ, विश्वदेव, (विश्वदेवा पित्रों की पुरोहित होते हैं जिनसे हमारे पितृ पित्र रोग में भी देव पूजन करवाते हैं।) दिव्यमहापित्रों के साथ निवास करते हैं।
  जब हम अपने पितरों के लिए अन्न, जल इत्यादि दान करते हैं, तो उस दिए गये दान के तत्क्षण तीन हिस्से हो जाते हैं।। पहला हिस्सा दिव्यमहा पित्रों के लिए जाता है।दूसरा हिस्सा पित्रोंके पुरोहित विश्वदेवा के लिए जाता है और तीसरा हिस्सा हमारे पित्रों के लिए होता है । इसीलिए इसीलिए पित्रों के लिए 3-3 जलाञ्जलि एवं तिलाञ्जलि दी जाती है।  जब हम अपने पितरों के लिए अन्न-जल दान करते हैं, तो पितृलोक में दिव्यमहा पितृ एवं विश्वदेवा भी अति प्रसन्न हो जाते हैं और वह हमारे पित्रों को शुभ आशीर्वाद देते हैं ।
जब हमारे पित्रों को शुभ आशीर्वाद देते हैं तो पितृ पितृलोक में अति प्रसन्न हो जाते हैं ।
 जब हमारे पितृलोक में प्रसन्न होते हैं, तो फिर हमारे पितृदेव हमारे ऊपर, हमारे परिवार पर भी प्रसन्न हो जातें है। और हमें आशीर्वाद प्रदान करते हैं, अपने वंश को शुभ आशीर्वाद देकर के धन  यशमान आदि का आशीर्वाद देते हैं ।
जब हम अपने पित्रों के लिए अन्नदानादि नहीं करते हैं, अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं तो पितृ दोष उत्पन्न हो जाता है, जो कि महान घातक दोष होता है। यह सब पितृ दोष के बारे में हम आपको पहले भी ऊपर में लिख चुके हैं।

श्राद्ध का समय:- श्राद्ध का समय हम आपको पहले भी बता चुके हैं जैसे कि पित्रों की जो मोक्ष तिथि होती है, जैसे:- प्रतिपदा(1), द्वितीया(2), तृतीया(3), से लेकर चतुर्दशी(14), पूर्णिमा (15), अमावस्या (30) तक की जो मृत्यु तिथि होती है। वह मोक्ष तिथि कहलाती है। मोक्ष तिथि के दिन श्राद्ध के पश्चात मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध अन्य पुण्य दिनों की दिन भी कर सकता है जैसे हम आपको ऊपर पहले भी लिख चुके हैं।

 परंतु श्राद्ध का समय हर दिन दोपहर में ही होता है। दोपहर काल में पितृ वेला प्रारंभ होती है। यह पितृ वेला, जब दिन आधा समाप्त हो जाता है, यानी जब दिन की दो प्रहर समाप्त हो जाएं और तीसरा प्रहर शुरू हो जाए तो, पितृ वेला शुरू हो जाती है।
शास्त्रमतानुसार सूर्य उदय के 6:00 से 6:30 घंटे के बाद पितृ वेला शुरू होती है । प्रातकाल देववेला होती है, और मध्यान्ह काल में पितृ बेला होती है ।
मध्यान्ह काल में पितृ अपने घर पर श्राद्ध लेने आते हैं ।
अतः श्राद्ध मध्यान्ह काल में करना चाहिए।
 मध्यान काल में श्राद्ध के लिए सुंदर सफेद रंग के वस्त्र पहने चाहिए, या तो अपने घर पर क्या तुलसी पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर के श्राद्ध तर्पण करने चाहिए।  पृथ्वी को गोबर से लेप करके, वहां पर श्राद्ध की सामग्री जो, तिल, चावल, धूप, दीप तुलसीदल, दूध कच्चा, गंगाजल, कुशा, गोपी चंदन, शहद, श्रद्धा व विश्वास, हल्दी और सफेद रंग की फूल जो पितरों को अति प्रिय होते हैं, यह पूजन सामग्री में रखना चाहिए । पितरों को सफेद रंग की वस्तु अति प्रिय होती है, इसीलिए पितृ पूजन में लाल, नीले, हरे, काले आदि वस्तुओं का और फूलों का त्याग किया जाता है। पूजन के समय ही पितृ आमान्य जिसे हम कच्चा अन्न कहते हैं, वह भोजन सामग्री पितरों को अति प्रिय होती है।  वह तर्पण करते समय वही पर रख दें, जहां  पितरों का पूजन एवं तर्पण किए जा रहे हो  वहीं पर रख दें।  मध्यान्ह काल में स्नान करके, सफेद एवं धोए हुए वस्त्रों को पहन कर के पूजन में बैठे। पुरोहित भी वेदपाठी ब्राह्मण नित्य गायत्री जपने वाले
सदाचारी व संयमित ब्राह्मण ही हो।  अपने पुरोहितों के द्वारा अपने पित्रों के तर्पण या पिंड दान इत्यादि अवश्य करवाना चाहिए। बलिवैश्वदेव यज्ञ, देव यज्ञ, भूत यज्ञ, पितृ यज्ञ, मनुष्य यज्ञ, ब्रह्मयज्ञ और पञ्चबली करनी चाहिए।
 अन्त में  ब्राह्मण भोजन करवाना चाहिए।
ब्राह्मण भोजन के सपरिवार सहित भोजन करें। श्राद्ध के दिन रात्रि में भोजन ना करे। केवल एक समय ही भोजन करना चाहिए।

श्राद्ध में यह न करें:-  दूसरे के अन्न का भक्षण, लोहे व मिट्टी के बर्तनों, क्रोध, प्रमाद, आलस्य, अपवित्रता, व्रत, मैथुन, तैलमर्दन, मांसभक्षण, मद्यपान, धू्म्रपान, का प्रयोग आदि न करें। किसी निमंत्रित व्यक्ति को कटुशब्द न कहें, बिल्व पत्र, अधिक सुगंध वाले लाल व काले फूलों का प्रयोग न करें। बासी अन्न, कीड़े, बाल पड़ा हुआ अन्न, कुत्ते द्वारा दृश्य, पहने हुए वस्त्र से ढका हुआ अन्न, बैंगन, मसूर, अरहर, गोल लौकी, कुम्हड़ा, शलजम, हींग, प्याज, लहसुन, काला जीरा व काला नमक, गाजर, आदि को न प्रयोग करें न परोसे। 
श्राद्ध किसको करना चाहिए :- 
 सबसे पहले अधिकार बङे पुत्र को ही है,  जिसके पुत्र न हो उसका श्राद्ध उसकी स्त्री, जिसके पत्नी नहीं हो, उसका श्राद्ध उसके सगे भाई, जिसके सगे भाई न हो, उसका श्राद्ध उसके दामाद या पुत्री के पुत्र (नाती) को और परिवार में कोई न होने पर उसने जिसे उत्तराधिकारी बनाया हो वह व्यक्ति उसका श्राद्ध कर सकता है। 

जिनकी मृत्यु , अस्त्र, शस्त्र, जीव, पशु, विष,  जलकर, डूबकर, दुर्घटना,आत्महत्या, विद्युत गिरने आदि कारणों से हुई हो उनकी ज्ञात तिथि को छोड़कर चतुर्दशी के दिन श्राद्ध किया जाता है। यानी जिस तिथि को उनकी मृत्यु होती है, उस तिथि को उनका श्राद्ध नहीं करना चाहिए, केवल चतुर्दशी के दिन ही उनका श्राद्ध करना चाहिए। जिनकी मोक्ष तिथि चतुर्दशी होती है, जिनकी मृत्यु चतुर्दशी तिथि के दिन होती है, उनका श्राद्ध चतुर्दशी के दिन नहीं बल्कि अमावस्या के दिन ही किया जाता है। 

श्राद्ध कब ना करें:-  जब गोत्र में किसी की मृत्यु हो चुकी हो और उसकी तेहरवीं क्रिया पूरी ना हुई हो,  मृतक पिंडदान ना हुए हो और अगर किसी का गोत्र में बच्चा जन्म ले लेता है और उसके 10 दिन के भीतर श्राद्ध नहीं करनी चाहिए ।
 स्त्री अपने मासिक धर्म पर चल रही हो तो 7 दिन तक देव और पितृ कर्म वर्जित होते हैं।
अतः इस समय भी श्राद्ध नहीं करना चाहिए।

इसलिए सभी मनुष्यों को अपने पित्रों का श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। श्राद्ध करने से पितरों को स्वर्ग में सुख मिलता है, बैकुंठ लोक में सुख मिलता है। पितृ अपने वंश को शुभ आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

श्राद्धों की गलत जानकारी देने वाले ब्राह्मणों {पुरोहित} को पितृ घातक दोष लगता है।  ब्राह्मण के प्रथम पुत्र कष्ट होता है।
सभी ब्राह्मणों को शास्त्रों के  अनुसार सही जानकारी और समय पर ही श्राद्ध करने  की जानकारी देनी चाहिए। - भगवन विष्णु 

कृपया श्राद्ध पंचांग के अनुसार करें। घर में लगे कैलेंडर के अनुसार नहीं करना चाहिए। इससे हानि होती है। कैलेंडर में पूरी अशुद्ध लिखी होती है, जिससे हम सही समय पर सद कर्म नहीं कर पाते हैं।



                                         शास्त्री बिपिन चंद्र
                        "ज्योतिषाचार्य"
श्रीकृष्णा गौशाला पुराणी दाना मण्डी जगराओं लुधियाना पंजाब 

Comments

  1. सर्वोत्तम शास्त्रानुसार जानकरी

    ReplyDelete

  2. शास्त्रानुसार श्राद्ध karm

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

                               पंचको में क्या करे और क्या न करे....
आज ३०/०५/२०१८ को पहली बार ब्लॉग में आया हूं।  इस ब्लॉग में सबसे पहली पोस्ट मैं भगवान गणपति जी का ध्यान और सदगुरुदेव जी का ध्यान करता हूं----  ।।   श्रीगणपतिजी की वंदना  ।।  ॐ गजाननं भूतगणादिसेवितं, कपित्थजंबूफलचारुभक्षणम्  । उमासुतंशोकविनाशकारकं,   नमामिविघ्नेश्वर पादपंकजं ।।    ।।  श्रीगुरुदेव जी की वंदना  ।।  ॐ   गुरूर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु देवो महेश्वरा।  गुरु साक्षात परमब्रहमा तस्मे श्रीगुरुवेनमः।।      ।।  श्री पंच परमेश्वरों की वंदना  ।।  ॐ  गणनाथ सरस्वती रवि शुक्र बृहस्पति।  पंचैतान स्मृतेनित्यं वेदवाणी प्रवर्तते।।